मधुपुर मोहन गेल रे
मोरा बिरहत छाती।
गोपी सकल बसरानी रे
जाट छल आहिवती।।
सुतली छलहुँ अपन गृह रे
निंदाई गेलउँ सपनाई।
करसों छुटल परसमनी रे
कोन गेल अपनाई।।
कत कहबो कत सुमिरब रे
हम भरिये गरनि।
आनक धन सों धनवंती रे
कुबजा भेल रानी।।
गोकुल चान चकोरल रे
चोरी गेल चंदा।
बिछुड़ी चललि दुहु जोड़ी रे
जीव दई गेल धंदा।।
काक भाख निज भाखह रे
पहु आओत मोरा।
खीर खाँड़ भोजन देब रे
भरि कनक कटोरा।।
भनहि विद्यापति गाओल रे
धैरज धर नारी।
गोकुल होयत सोहाओन रे
फेरि मिलत मुरारी।।
व्याख्या-
मोहन मथुरा चलेगए हैतथा उनके विरह में मेरी छाती वयोग सेफट रही है। जितनी भी सौभाग्यशाली गोपियाँ थीं जो उनके मात्र दर्शन से जी रही थीं उन सभी को छोड़कर वो चले गए गए है,उन्हें भूल गए हैं।मैं अपने घर मे सो रही थी और नींद में मुझे सपना आया कि मेरे हांथो से स्पर्शमणी गिर गई और उसे किसी ने ले लिया अर्थात कृष्ण मुझसे बिछड़कर किसी और के पास चले गए है।मैं कितना कहूंगी और कितना स्मरण करूँगी?मैं ग्लानि से भर गई हूं।देखो कुब्जा किसी ओर के धन (कृष्ण)को लेकर खुद रानी बन बैठी है।गोकुल के जो चाँद थे मेरे कृष्ण वो चकोर हो गए हैं उनकोे किसी ने चुरा लिया है।दोनो अर्थात राधा-कृष्ण की जोड़ी बिछड़ गई है तथा इस बिछोह ने मेरे लिए परेशानी खड़ी कर दी है मेरा हृदय संकट में है।हे काग तुम अपनी भाषा मे ऐसा शुभ समाचार सुनाओ कि मेरा प्रियतम आ रहा है,तो मैं तुमको सोने की कटोरी में दूध और चीनी भर के खाने को दूंगी।कवि विद्यापति कहते है कि हे गोपी!तुम धीरज रखो क्योंकि कृष्ण यही आएंगे और गोकुल फिर से हरा -भरा तथा सुहावना हो जाएगा।
(2)भाषा संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों से युक्त है।
(3)यह पदावली मधुर-मनोहर मैथली में रचित है।
मोरा बिरहत छाती।
गोपी सकल बसरानी रे
जाट छल आहिवती।।
सुतली छलहुँ अपन गृह रे
निंदाई गेलउँ सपनाई।
करसों छुटल परसमनी रे
कोन गेल अपनाई।।
कत कहबो कत सुमिरब रे
हम भरिये गरनि।
आनक धन सों धनवंती रे
कुबजा भेल रानी।।
गोकुल चान चकोरल रे
चोरी गेल चंदा।
बिछुड़ी चललि दुहु जोड़ी रे
जीव दई गेल धंदा।।
काक भाख निज भाखह रे
पहु आओत मोरा।
खीर खाँड़ भोजन देब रे
भरि कनक कटोरा।।
भनहि विद्यापति गाओल रे
धैरज धर नारी।
गोकुल होयत सोहाओन रे
फेरि मिलत मुरारी।।
प्रसंग-
प्रस्तुत पंक्ति कविवर विद्यापति द्वारा रचित'पदावली' के 'विरह' शीर्षक से लिया गया है।कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद कोई विरहणी गोपी अपनी व्यथा का वर्णन अपनी सखी गोपी से करती है उसी का उल्लेख इस पद में किया गया है।
व्याख्या-
मोहन मथुरा चलेगए हैतथा उनके विरह में मेरी छाती वयोग सेफट रही है। जितनी भी सौभाग्यशाली गोपियाँ थीं जो उनके मात्र दर्शन से जी रही थीं उन सभी को छोड़कर वो चले गए गए है,उन्हें भूल गए हैं।मैं अपने घर मे सो रही थी और नींद में मुझे सपना आया कि मेरे हांथो से स्पर्शमणी गिर गई और उसे किसी ने ले लिया अर्थात कृष्ण मुझसे बिछड़कर किसी और के पास चले गए है।मैं कितना कहूंगी और कितना स्मरण करूँगी?मैं ग्लानि से भर गई हूं।देखो कुब्जा किसी ओर के धन (कृष्ण)को लेकर खुद रानी बन बैठी है।गोकुल के जो चाँद थे मेरे कृष्ण वो चकोर हो गए हैं उनकोे किसी ने चुरा लिया है।दोनो अर्थात राधा-कृष्ण की जोड़ी बिछड़ गई है तथा इस बिछोह ने मेरे लिए परेशानी खड़ी कर दी है मेरा हृदय संकट में है।हे काग तुम अपनी भाषा मे ऐसा शुभ समाचार सुनाओ कि मेरा प्रियतम आ रहा है,तो मैं तुमको सोने की कटोरी में दूध और चीनी भर के खाने को दूंगी।कवि विद्यापति कहते है कि हे गोपी!तुम धीरज रखो क्योंकि कृष्ण यही आएंगे और गोकुल फिर से हरा -भरा तथा सुहावना हो जाएगा।विशेष-
(1) अलंकार - मधुपुर-मोहन,सुतालि-सपनाई,कत-कहबो,कनक-कटोरा,धैरज-धर,चोरी-चंद में अनुप्रास ,गोकुल चान चकोरल में अर्थापत्ति तथा चोरी गेल चंदा में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।(2)भाषा संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों से युक्त है।
(3)यह पदावली मधुर-मनोहर मैथली में रचित है।


3 Comments
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ReplyDeleteAm Ebenezer the Admin of Lexitech eatechgh.blogspot.com
DeleteHow can i contact you
you can mail me..
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